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सिद्ध योग, शिव योग एवं क्रिया योग जैसी समस्त कुंडलिनी योग धाराओं में ‘दीक्षा’ का विशेष महत्त्व है। साधना के प्रारंभिक चरण में आंतरिक ऊर्जा धाराओं को संरेखित (Align) करने और प्राण के प्रवाह को ऊर्ध्वगामी (Urdhva Gati) बनाने हेतु साधक को एक अनुभवी मार्गदर्शक के संरक्षण की आवश्यकता होती है। इस पावन प्रक्रिया में गुरु अपनी प्राण शक्ति के माध्यम से साधक के भीतर आवश्यक रूपांतरण का सूत्रपात करते हैं। यह दीक्षा साधक की प्रत्यक्ष उपस्थिति में ऊर्जा शुद्धिकरण और एकाग्रता के विशिष्ट चरणों के पश्चात संपन्न की जाती है। इसके सफल संपादन हेतु साधक को कुछ प्रारंभिक अभ्यासों और दीक्षा के दिन विशेष आहार नियमों का पालन करना अनिवार्य है। यह प्रतिबद्धता की वह आधारशिला है, जिसका एकमात्र उद्देश्य साधक की ऊर्जा को ऊर्ध्वगति प्रदान कर आध्यात्मिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त करना है।
क्रम दीक्षा की आवश्यकता: सिद्ध योग के साधक के लिए ऊर्जा का जागरण और उसका ऊर्ध्वगामी होना केवल प्रथम चरण है। अपनी साधना के विभिन्न स्तरों पर साधक को निरंतर ‘दीक्षा’ की आवश्यकता होती है—इनमें से कुछ दीक्षाएं साधक की व्यक्तिगत आवश्यकताओं पर आधारित होती हैं, तो कुछ किसी विशिष्ट स्तर पर वांछित परिणाम प्राप्त करने के लिए अनिवार्य होती हैं। उदाहरण के तौर पर, चक्र साधना में प्रत्यक्ष सिद्धि हेतु ‘चक्र क्रिया दीक्षा’ अनिवार्य है, जबकि ‘महावेध दीक्षा’ की आवश्यकता केवल तब होती है जब साधक को साधना के मार्ग में निरंतर बाधाओं और विक्षेपों का सामना करना पड़ रहा हो। इसी प्रकार, मन से परे गहन ध्यान की अवस्था प्राप्त करने के लिए ‘समाधि दीक्षा’ अत्यंत आवश्यक है, जो साधना के अगले स्तर पर प्रगति के लिए अनिवार्य मानी जाती है
इस प्रकार, जहाँ ‘चक्र क्रिया दीक्षा’ साधना के परिणामों को तीव्र करने हेतु दी जाती है, वहीं ‘महावेध दीक्षा’ साधक की व्यक्तिगत परिस्थितियों के अनुसार एक वैकल्पिक चुनाव है। किंतु, ‘समाधि दीक्षा’ प्रथम योग दीक्षा की भाँति ही एक अनिवार्य चरण है, जो ऊर्जा के ऊर्ध्वगामी प्रवाह को पूर्णता प्रदान करती है। यह ‘क्रम दीक्षा’ पद्धति यह सुनिश्चित करती है कि प्रत्येक साधक को व्यक्तिगत मार्गदर्शन प्राप्त हो, जिससे उनकी आध्यात्मिक प्रगति सुचारू और व्यवस्थित रूप से संपन्न हो सके
दुर्भाग्यवश, आज योग के नाम पर बाजारवाद हावी है। अधिकांश आधुनिक गुरु साधक की वास्तविक प्रगति की अनदेखी कर केवल सतही शिक्षा तक सीमित हैं, या फिर पर्याप्त सुरक्षा और मार्गदर्शन के बिना ही कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत करने का जोखिम उठाते हैं। भ्रामक मार्गदर्शन और ऊर्जा के अनुचित संरेखण (Misalignment) के कारण कई साधकों को गंभीर शारीरिक एवं भावनात्मक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। जहाँ सिद्ध पद्धति में दीक्षा के अत्यंत कड़े और अनिवार्य नियम हैं, वहीं आज कई संस्थानों ने योग दीक्षा और कुंडलिनी जागरण को एक ऑनलाइन व्यापार या महज एक ‘इवेंट’ बना दिया है, जिसमें इस प्राचीन विज्ञान की पवित्रता और आवश्यक अनुशासन की पूरी तरह उपेक्षा की जाती है